Monday, September 15, 2014

किताबें धूल फांकती है शेल्फ पर
















किताबें धूल फांकती है शेल्फ पर
अरसा हो गया है
उन्हें पढ़े हुए
मैं नहीं खोलता अब उनके वर्क –
कि अब उन लफ्ज़ों में
ठहरता नहीं है मन

रात जब मद्धम करके रौशनी को
अपनी टेबल पर बैठता हूँ
तो उन किताबों से खुद ब खुद निकल कर
आ बैठते हैं कुछ अल्फाज़ मेरे ज़ेहन में
बहुत शोर करती है
लफ्ज़ों की खनखनाहट
मगर जब इन्हें समेट कर
लिखना चाहूँ जो राइटिंग पैड पर
तो गायब हो जाते हैं अचानक ...

अब इनसे मेरा वास्ता नहीं रहा कोई
ना मैं अब इनके करीब जाता हूँ
ना ये मेरे करीब आते हैं |

अरसा हो गया
किताबें धूल फांकती है शेल्फ पर ....!!


मानव मेहता ‘मन’ 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-05-2015) को "कौन सा और किस का दिवस" (चर्चा अंक-1964) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

    ReplyDelete
  2. सच किताबों की दुनिया सिमटती जा रही है
    बहुत बढ़िया रचना
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

    ReplyDelete

आपकी टिपणी के लिए आपका अग्रिम धन्यवाद
मानव मेहता