Wednesday, August 08, 2012

रुखसत मेरी














इस वक्त यूँ लगता है कि सब कुछ मोहम्मल है
तू.... मैं..... और ये रब्त........ तेरा मेरा

ये हवाएं यूँ ही बेरंग चलती फिरती है रात भर
जाने कब रुकेगी,कहाँ थमेगी,कहाँ है इनका बसेरा...

अजीब से हालातों से गुजर रहा हूँ आजकल
खालीपन है आँखों में और अफसुर्दा है चेहरा.....

शाम ढल चुकी है अब जनाजा न उठा पाओगे तुम
अब तो मैं तभी रुखसत लूँगा जब होगा सवेरा....!! 


मानव मेहता 'मन' 

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मानव मेहता