Friday, August 23, 2013

चाँद और तेरी महक









रात भर झांकता रहा चाँद
मेरे दिल के आँगन में.......
कभी रोशनदान से
तो कभी चढ़ कर मुंडेरों पे
कोशिश करता रहा
मेरे अंदर तक समाने की.....

जाने क्या ढूँढ रहा था
गीली मिट्टी में...!!

तेरी यादों को तो मैंने
संभाल के रख दिया था
इक संदूक में अरसा पहले......

फिर भी न जाने कैसे
उसे उनकी महक आ गई...

चलो अब यूँ करें कि
आज दिल के सारे खिड़की-दरवाजे
बंद करके सोयें
कहीं आज फिर
चुरा न ले वो तुझे मुझसे......!! 



Manav Mehta 'मन'

18 comments:

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    1. शुक्रिया कालीपद जी।

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  2. बहुत सुंदर और भावपूर्ण .....

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    1. धन्यवाद अदिति जी।

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  3. कहीं आज फिर चुरा न ले वो तुझे मुझसे .. वाह .. बहुत सुन्दर कविता .. बेहद भावपूर्ण!

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    1. शुक्रिया शालिनी जी, रचना पसंद करने के लिए।

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  4. रूमानी और खुबसूरत!

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    1. शुक्रिया स्नेहा।

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  5. कोमल भाव लिए सुन्दर रचना...
    :-)

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    1. रीना जी, धन्यवाद।

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  6. बेहद सुंदर...कहीं .आज.. फिर.. चुरा न ले तुझे ..मुझसे...

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    1. शुक्रिया मंजूषा....:)

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. लाजवाब.. तारीफ़ की तारीफ़ कैसे की जाए..

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    1. आपका बेहद शुक्रिया... पसंद करने के लिए।

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  10. बहुत सुंदर और भावपूर्ण

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आपकी टिपणी के लिए आपका अग्रिम धन्यवाद
मानव मेहता