Thursday, May 16, 2013

हाल-ए-जिन्दगी
















ना राह ना मंजिल, कुछ ना पाया जिन्दगी में
ना जाने कैसा मोड़ ये आया जिन्दगी में


तकलीफ,दर्द,चुभन,पीड़ा सब कुछ मिले इससे
फ़कत एक खुशी को ही ना पाया जिन्दगी में

वक़्त के मरहम ने सभी घाव तो भरे मेरे
मगर जख़्मों से बने दाग को पाया जिन्दगी में

औरों की खुशी के लिए अपनी खुशी भूल गए
मुस्कराते हुए अकसर गम छुपाया जिन्दगी में

तन्हाइयों को चीरती आवाज ना सुन सका कोई
इस कदर खुद को अकेला पाया जिन्दगी में..... 



मानव मेहता 'मन'

25 comments:

  1. HEART TOUCHING VERY NEAR TO LIFE

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  2. वाह ... बेहतरीन

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  3. लाजवाब ... खुशियां आसानी से नहीं मिलती जिंदगी में ...
    को गई दिल को रचना ...

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  4. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 18/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

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  5. इसी का नाम जिंदगी है....सभी शेर एक से बढ़कर एक....बहुत खूब...!

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  6. लाजवाब ,मर्मस्पर्शी रचना

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post वटवृक्ष

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  7. बहुत सुन्दर हर पंक्ति भावपूर्ण लगी !

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  8. मुस्कराते हुए गम छिपाया हमने ज़िन्दगी में,.......
    यही तो ज़िन्दगी है जनाब ,काफी करीब है,बयां न कर पाने वालों के.सुन्दर रचना.

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  9. आह ......
    हाल-ए-बयाँ जिंदगी का

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  10. ........मर्मस्पर्शी रचना

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    1. शुक्रिया संजय जी।

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  11. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
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मानव मेहता