Wednesday, March 20, 2013

दर्द












कुछ रोज पहले ही तो-
दफ़नाया था तुझको...
मकान के पिछले लॉन में.....


मिट्टी की जगह डाले थे,
कुछ लम्हें अफसुर्दगी के-
और अपनी आँखों का खरा पानी भी-
छिड़का  था उस पर ...
और सबसे ऊपर अपने ज़ख्मों का-
बड़ा सा पत्थर भी रख छोड़ा था उस पर....

सोचा था जिंदगी अब से आसान गुजरेगी....
हुं.....!!!

वहम था मेरा.....
भला नाखूनों से भी माँस जुदा हुआ है कभी....

कल रात उस जगह-
इक पौधा उग आया है फिर से...
कल रात से दर्द अब फिर से मेरे साथ है.....!!!


:- मानव मेहता 'मन'

19 comments:

  1. दर्द कहाँ दफ़न हो पाता है ... उग आता है बार बार ...
    गहरे भाव लिए ...

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  2. बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  3. कहाँ दफ़न होता है दर्द कहीं दफ़नाने से...गर ऐसा होता तो क्या बात थी..।

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  4. आपकी पोस्ट कल के चर्चा मंच पर है
    आभार

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  5. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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  6. जब तक ज़िंदगी की मिट्टी उपजाऊँ है तब तक दर्द के पौधों का उगना जारी रहेगा। गहन भाव अभिव्यक्ति...

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  7. आह...बहुत खूब है ये दर्द भी

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  8. कल दिनांक25/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  9. क्या कहूं ...हर शब्द की टीस महसूस हुई

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आपकी टिपणी के लिए आपका अग्रिम धन्यवाद
मानव मेहता