Tuesday, May 08, 2012

दर्द















वक्त को हथेली पर रख कर
ऊँगलियों पर लम्हें गिने हैं...
दर्द देता है हौले से दस्तक-
इन लम्हों के कई पोरों में बसा हुआ है वो....!!

ज़ब्त करती हैं जब पलकें,
किसी टूटे हुए ख्वाब को-
आँखों में दबोचती हैं
तब पिघलता नहीं है मोम-
बस टुकड़े चुभते हैं उस काँच के....!!

इन आँखों से अब पानी नहीं रिसता,
दर्द अब पत्थर हो चला है.....!!

14 comments:

  1. सिहरन सी अनुभूति

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  2. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 10 -05-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....इस नगर में और कोई परेशान नहीं है .

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  3. मन को छू गयी आपकी कविता ...

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  4. कुछ ही शब्दों में बहुत कुछ कह दिया दिल में उतर गए शब्द
    वाह ...बहुत सुन्दर

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  5. सुंदर कविता है, मगर दूसरे पैरे का पहला शब्द समझ नहीं आया - वह जब्त है या जज्ब!

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  6. जबत करती हैं जब पलकें,
    किसी टूटे हुए ख्वाब को-
    आँखों में दबोचती हैं
    तब पिघलता नहीं है मोम-
    बस टुकड़े चुभते हैं उस काँच के...

    यह कविता मन को छू लेती है, आत्मीय लगती है
    मानव जी,...समर्थक बन गया हूँ,आप भी बने मुझे खुशी होगी,

    WELCOME TO MY RESENT POST t....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. इन आँखों से अब पानी नहीं रिसता,
    दर्द अब पत्थर हो चला है...........
    शानदार कविता पढ़वाई आपने
    शुक्रिया संगीता दीदी

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  9. मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  10. आप सभी मित्रों का बहुत बहुत शुक्रिया.......
    आभार.....!!!

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  11. दीपिका जी....शुक्रिया आपका इस रचना को पसंद करने के लिये... ये शब्द जब्त है....:)

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आपकी टिपणी के लिए आपका अग्रिम धन्यवाद
मानव मेहता